मै, मेरा इश्क और बनारस।

मैं इश्क़ लिखूं, तुम बनारस समझना कुछ यूं ही तुम इसे, मेरे प्यार का इजहार समझना। हर शाम की तरह उस शाम भी बैठा था गंगा किनारे निहार रहा था तुझे जैसे तेरी जुल्फें तेरी मुस्कान को छुपाती है वैसे ही कुछ घाट इस गंगा को फर्क सिर्फ इतना है कि शर्माना तुम्हारा गहना है…