ऐसी_भी_कोई_ख्वाहिश_नहीं

चलना चाहती हूँ उन रास्तों पर जो तुम तक जाती हो, मंजिल मिल जाये , ऐसी भी कोई ख्वाहिश नहीं माना …हमारा साथ थोड़े कम पलों का हो, लेकिन तुम्हारे हर वक्त पर मेरा हक हो , ऐसी भी कोई ख्वाहिश नहीं तुम बेपरवाह हो तो वही सही , मेरी फिक्र तुम्हारा शुकून छीन ले…

निकल खुद की तलाश में

खुद को तू आजाद कर आजाद कर इस दुनिया की माया से मकसद पहचान खुद की छोड़ दे वह माकन जिसमे तू है गुलाम पहचान कर खुद की तू निडर है राही अपनी नैया खुद संभाल ना दे चौकी दूसरों को छोड़ दे वो लोगो को जिस के इशारो पर था कभी तू नाचता अपना…

#Yet another story to tell! But I won’t be telling it to you.

  It’s been a long time since I felt this, the feeling of emptiness and satisfaction together. It’s an eccentric feeling this heart ache, where you feel every beat that your heart skips. Mornings are the worst because you wake up after a beautiful dream yet to realize it was just a dream. Noon is…

बनारस में अक्सर इश्क़ मुकम्ल होते देखा है

बनारस में अक्सर इश्क़ मुकम्ल होते देखा है भले जमीन में ना सही आसमां में होते देखा है अधूरा इश्क़ लिए मिले हम फिर बनारस की शोर में मुकम्ल की आस ना लिए छोड़ दिए गंगा की चरणों में सदियों के बिछड़े हुए गुम थे गंगा की लेहरो में आरती के वक़्त घाट में मिलते…